
कल रात
कुछ बारिश की बूंदों को
अठखेलियाँ करते मैंने देखा..
रूबरू हुईं - तो कहने लगी....
तुम बरसते क्यूँ नही ??
आओ..बरसो, बरसो हमारे साथ.
तभी तो रीते होओगे
और जी सकोगे कुछ नया नया..
अपनी जद्दोजहद में
ना ही जिस्म में समेटा उन्हें
ना ही बरसा उनके साथ..
वो फिर भी बरसती और खेलती रही
मेरे अकेलेपन को भरती रही..
यकायक कुछ सुर्ख बूँदें देखी मैंने -
और चिढाती हुयी सी बाक़ी सब.
कुछ पीली कुछ लाल..
खेलती हुयी उनके साथ
उनमे समा गयी..!!!
आँखें खुली जब...
सवेरे देखा -
तो डायरी खुली पडी थी..
कुछ पन्ने फटे हुए थे..
और कुछ धुले हुए थे..
पता नहीं -
ख्वाब था शायद
या मेरा भरम..
पर आज मन बहुत हल्का सा है..!!!!
1:39 pm San Diego California
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