उम्र भर सीने से लगाए रक्खा
जिसे उसका ख़त कह कर
जल्वागाह-ऐ-खिलावत-ऐ-शब*
अफ़साने ही थे वो तमाम
खुद ही लिखता रहा ख्वाब
और दे दी कसम उसके पयाम की
*Tales of her beauty in solitude of evenings
December 6th, 2008 2.00 pm, California
Saturday, December 6, 2008
अब मेरे बस की बात नहीं...!!!
एक घर में
दो ही केवल -
दो ही मनुष्य रहते
एक खेलता -
छिप कर सपने -
एक जल कर झरता,
एक हँसता
तारों के अधरों से
फूलों कि गंध ले कर
एक रोता
धरती की छाती पर
कूलों को बंधन मान कर,
एक आता -
प्रिय के रूप में -
झिझकता सकुचाता सा
दूसरा रहता
रुद्ध गेह में -
शून्य शयन पर पड़ा हुआ सा
एक मुक्त
शिशु के प्राणों में -
नाचता आकाश भर कर
दूसरा तल्लीन -
निज कर्मों में
मरता जल-भुन कर
एक स्तब्ध
गिरी गुफा
सरिता सागर पार कर,
एक क्षुब्ध
घूम फिर कर -
नहीं पाता कहीं पहचान
एक निरंतर धावित
बहु वेशों में -
ध्वंस-सृजन के ताल ताल में,
दूसरा मरता
देश देश में -
क्षण-क्षण में काल काल में
इन दो मनुष्यों के जीवन
में कैसे भी करना है समन्वय -
एक साथ क्यूंकि -
दो दो जीवन जीना
अब मेरे बस की बात नहीं...!!!
December 5th 2008, 1.45 pm, California
दो ही केवल -
दो ही मनुष्य रहते
एक खेलता -
छिप कर सपने -
एक जल कर झरता,
एक हँसता
तारों के अधरों से
फूलों कि गंध ले कर
एक रोता
धरती की छाती पर
कूलों को बंधन मान कर,
एक आता -
प्रिय के रूप में -
झिझकता सकुचाता सा
दूसरा रहता
रुद्ध गेह में -
शून्य शयन पर पड़ा हुआ सा
एक मुक्त
शिशु के प्राणों में -
नाचता आकाश भर कर
दूसरा तल्लीन -
निज कर्मों में
मरता जल-भुन कर
एक स्तब्ध
गिरी गुफा
सरिता सागर पार कर,
एक क्षुब्ध
घूम फिर कर -
नहीं पाता कहीं पहचान
एक निरंतर धावित
बहु वेशों में -
ध्वंस-सृजन के ताल ताल में,
दूसरा मरता
देश देश में -
क्षण-क्षण में काल काल में
इन दो मनुष्यों के जीवन
में कैसे भी करना है समन्वय -
एक साथ क्यूंकि -
दो दो जीवन जीना
अब मेरे बस की बात नहीं...!!!
December 5th 2008, 1.45 pm, California
Thursday, December 4, 2008
स्वेटर
बरसों पहले -
लड़कपन के दिनों में
मै देखता था ख्वाब तुम्हारे.
और तुम -
मेरे ख़्वाबों को बुना करती थी.
अक्सर मै हैरान हो उठता था
कैसे ??
कैसे तुम मेरे ख़्वाबों को बुन सकती हो !!!
जैसे स्वेटर बुनते वक्त,
माँ को उँगलियों का भान नहीं होता..
शायद तुम्हे भी
पता न हो कैसे तुम
मुझ में सिहरन पैदा करती हो..
पता नहीं -
वो ख्वाब अधूरे रह गए..
या अधूरे ख्वाब थे..!!!
मेरी पसंद से मेरे लिए बुना गया स्वेटर -
मै कभी पहन नहीं पाया !!!
Nov.14, 2008 Sorrento valley, San Diego
लड़कपन के दिनों में
मै देखता था ख्वाब तुम्हारे.
और तुम -
मेरे ख़्वाबों को बुना करती थी.
अक्सर मै हैरान हो उठता था
कैसे ??
कैसे तुम मेरे ख़्वाबों को बुन सकती हो !!!
जैसे स्वेटर बुनते वक्त,
माँ को उँगलियों का भान नहीं होता..
शायद तुम्हे भी
पता न हो कैसे तुम
मुझ में सिहरन पैदा करती हो..
पता नहीं -
वो ख्वाब अधूरे रह गए..
या अधूरे ख्वाब थे..!!!
मेरी पसंद से मेरे लिए बुना गया स्वेटर -
मै कभी पहन नहीं पाया !!!
Nov.14, 2008 Sorrento valley, San Diego
Saturday, August 30, 2008
पत्थर
मैं तराशता गया खुद को
सफीने रोशन की तरह
रकीबों को भी कहाँ इल्म था..
उनके पत्थर पे लिखे पैगाम का...
सफीने रोशन की तरह
रकीबों को भी कहाँ इल्म था..
उनके पत्थर पे लिखे पैगाम का...
Tuesday, August 5, 2008
..मैं..
मन के तारों को झंकृत कर,
मुझ में सोये संगीत को
क्यूँ जगाना चाहते हो ?
मुझे -
पहले ये तो जान लेने दो -
मैं कौन हूँ..
मन ? झंकार ? तार ?
संपूर्ण संगीत..? या समग्र आकाश ??
इस प्रकाश की परिधि के बाहर
मैं अपने अवशेषों को देख नहीं पाता..
पर अनभिज्ञ नहीं
ईड़ा-शुषुमना-पिंगला की सूक्ष्म चेतनाओं से...
जो कभी कभी इस देह से परे
कभी कभी चौथे कोण का स्पर्श करती है..
मुझे बताती है -
मेरा होना निरर्थक नहीं है...
मुझे प्रकाश की कुण्डली जलानी है...
उन सूक्ष्म चेतनाओं को जीना है..
गहनतम अन्धकार में
चमकने वाले ये असंख्य तारे -
मेरी चाल को बाधित नहीं कर सकते
क्यूंकि ये मैं हूँ...
मैं..
मुझ में सोये संगीत को
क्यूँ जगाना चाहते हो ?
मुझे -
पहले ये तो जान लेने दो -
मैं कौन हूँ..
मन ? झंकार ? तार ?
संपूर्ण संगीत..? या समग्र आकाश ??
इस प्रकाश की परिधि के बाहर
मैं अपने अवशेषों को देख नहीं पाता..
पर अनभिज्ञ नहीं
ईड़ा-शुषुमना-पिंगला की सूक्ष्म चेतनाओं से...
जो कभी कभी इस देह से परे
कभी कभी चौथे कोण का स्पर्श करती है..
मुझे बताती है -
मेरा होना निरर्थक नहीं है...
मुझे प्रकाश की कुण्डली जलानी है...
उन सूक्ष्म चेतनाओं को जीना है..

गहनतम अन्धकार में
चमकने वाले ये असंख्य तारे -
मेरी चाल को बाधित नहीं कर सकते
क्यूंकि ये मैं हूँ...
मैं..
Monday, June 30, 2008
खुश आमदीद
कुछ हर्फों
और कुछ लफ्जों से
मैंने बुना था एक ताना बाना !!
और ज़ज्बातों की रौ में,
लिखा था एक फ़साना !!
मेरे अक्स का एक नशा है -
जो तेरे बदन का बोसा है !!
खुश आमदीद है तेरा....
मेरे इस ताने बाने में -
सबसे पहला तेरा आगाज़ हुआ...
तेरी झुकी पलकों में॥
अपने अक्स के नशे का एहसास हुआ ...!!!
और कुछ लफ्जों से
मैंने बुना था एक ताना बाना !!
और ज़ज्बातों की रौ में,
लिखा था एक फ़साना !!
मेरे अक्स का एक नशा है -
जो तेरे बदन का बोसा है !!
खुश आमदीद है तेरा....
मेरे इस ताने बाने में -
सबसे पहला तेरा आगाज़ हुआ...
तेरी झुकी पलकों में॥
अपने अक्स के नशे का एहसास हुआ ...!!!
बरसात
लघ्जिशों की तमन्ना है ये...
ख़यालों की बरसात
सम्हल कर रहना हमदम मेरे
कभी कभी ये बरसात
मुखौटों के रंग फीकें कर देते हैं..
ख़यालों की बरसात
सम्हल कर रहना हमदम मेरे
कभी कभी ये बरसात
मुखौटों के रंग फीकें कर देते हैं..
आग
ये मैं बह जाता हूँ ज़ज्बातों में,
या तेरे ख़याल तर कर जाते हैं मुझको॥
कुछ तो है इस कमबख्त आग में...
जो तुझे भी जलाती है...
और मुझे भी जला रही है मुसलसल..
या तेरे ख़याल तर कर जाते हैं मुझको॥
कुछ तो है इस कमबख्त आग में...
जो तुझे भी जलाती है...
और मुझे भी जला रही है मुसलसल..
विस्तार
जड़ें गहरी होती जाती हैं...
जितने ही तुम करीब आते हो !!
मुझमे समा कर मुझे,
आसमान का विस्तार दे दो...!!!
जितने ही तुम करीब आते हो !!
मुझमे समा कर मुझे,
आसमान का विस्तार दे दो...!!!
सफर
कुछ नहीं रक्खा है
यूँ खामोशी से गुजर जाने में
यादें भी खो जाती हैं
रफ़्ता रफ्ता गुजर जाने में
अश्कों से नहीं धुलती
किताब-ए-माजी के लघ्जिश
कुछ दोस्तों के दामन साथ हों
उंगलियों में सिमट आती हैं वक्त,
जिन्दगी और याद ये सफर
फिर - पलों में गुजर ही जाती है... !!
यूँ खामोशी से गुजर जाने में
यादें भी खो जाती हैं
रफ़्ता रफ्ता गुजर जाने में
अश्कों से नहीं धुलती
किताब-ए-माजी के लघ्जिश
कुछ दोस्तों के दामन साथ हों
उंगलियों में सिमट आती हैं वक्त,
जिन्दगी और याद ये सफर
फिर - पलों में गुजर ही जाती है... !!
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