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Saturday, June 21, 2008
कस्तूरी
ढूँढत रहा जग माही
खुशबू जो बिखरे चहुँ ओर
ज्यों कस्तूरी नाभि बसे
बैरन रहा उस ओर....
जब बारे इस मिट्टी को
तब जाने मोल तुम्हारी ....
स्पर्श - १
लहरों का उठना,
नाव का डगमगाना,
पतवार का छूटना,
कुछ भी नहीं होता -
पूर्वनियोजित ।
फिर भी मन सोचता है,
स्पर्श से पहले -
मन बहुत सोचता है...!!!!
1215pm Jan 01,2008. California
नाव का डगमगाना,
पतवार का छूटना,
कुछ भी नहीं होता -
पूर्वनियोजित ।
फिर भी मन सोचता है,
स्पर्श से पहले -
मन बहुत सोचता है...!!!!
1215pm Jan 01,2008. California
मन (स्पर्श -२)
विवेक को हराना,
दलीलों को ठुकराना,
ज़ज्बातों को बहकाना,
सब कुछ समझता है मन...
फिर भी -
बहकता है मन
कोई खूबसूरत गुनाह
करने को मचलता है मन
और फिर -
ये तसल्ली भी देता है मन -
सब कुछ पूर्वनियोजित था -
मेरी किस्मत में यही लिखा था !!!
दलीलों को ठुकराना,
ज़ज्बातों को बहकाना,
सब कुछ समझता है मन...
फिर भी -
बहकता है मन
कोई खूबसूरत गुनाह
करने को मचलता है मन
और फिर -
ये तसल्ली भी देता है मन -
सब कुछ पूर्वनियोजित था -
मेरी किस्मत में यही लिखा था !!!
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